बैहर
सबई घास की रस्सी और बाँस के फर्नीचर के नवाचार, जो आगे चलकर बड़े उद्योग बने।
ॐ सीताराम
श्री अभिनन्दन दीक्षित
संस्थापक, किसान सहयोग · सेवानिवृत्त उप वन संरक्षक (DCF), मध्य प्रदेश शासन
WE WILL DO IT
मेरा जन्म सागर ज़िले के खुरई में, एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। पाँच भाइयों और चार बहनों के भरे-पूरे परिवार में मैं सबसे छोटा था, इसलिए बड़े भाई-बहनों का स्नेह और संरक्षण मुझे बचपन से मिला।
मेरी माँ, श्रीमती त्रिवेणी बाई दीक्षित, खेती करती थीं। खेत, बीज, बारिश का इंतज़ार और फसल की चिंता मेरे लिए किताबी बातें नहीं, घर की रोज़ की बातें थीं। मेरे पिता, पंडित शालिग राम दीक्षित, प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। शिक्षा और ईमानदारी का महत्व मैंने अपने घर से सीखा।
मेरी पढ़ाई ग्राम धंगर के स्कूल से शुरू हुई। फिर सागर का लाल स्कूल, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से 11वीं बोर्ड, और फिर सागर विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान।
मैं किसान परिवार से हूँ और अपनी सेवा में गाँवों और किसानों के बीच काम किया है। इसलिए किसान की समस्याएँ और उसके सामने खुले अवसर, दोनों समझता हूँ। अब मैं अपना अनुभव किसान की भलाई में लगाना चाहता हूँ। हमारे दो उद्देश्य हैं:
किसान की आय बढ़ाना
रोज़गार के अवसर बनाना
तकनीक की मदद से हम किसान तक सही जानकारी और बेहतर बाज़ार पहुँचाएँगे, ताकि उसकी कमाई बढ़े। इसी रास्ते से गाँव में ही काम के नए अवसर बनेंगे।
1981 में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग में मेरा चयन हो गया। सागर विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान की एम.एससी. (पूर्वार्ध) की पढ़ाई मुझे बीच में छोड़नी पड़ी। 1982-83 में नॉर्दर्न फॉरेस्ट रेंजर्स कॉलेज से फॉरेस्ट्री का डिप्लोमा किया। एक साल के कठिन प्रशिक्षण के बाद प्रदेश के कई ज़िलों में सेवा करने का अवसर मिला। 42 वर्ष की सेवा के बाद 2023 में उप वन संरक्षक (DCF) पद से सेवानिवृत्त हुआ।
सबई घास की रस्सी और बाँस के फर्नीचर के नवाचार, जो आगे चलकर बड़े उद्योग बने।
सेवा के अंतिम वर्ष में "बुंदेली व्यंजन, बिजावर" की शुरुआत, जिसे प्रदेश स्तर पर कई पुरस्कार मिले।
2011
वर्ष 2007-08 के उत्कृष्ट वानिकी कार्यों के लिए 20 अप्रैल 2011 को म.प्र. शासन द्वारा।
2014-15
वर्ष 2014-15 में कृषि क्षेत्र में सफल रोपण का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज हुआ।
सेवानिवृत्ति के बाद भी भारत विकास परिषद, आदिवासी विकास मंच और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हूँ।
2011 से मैं चाहता था कि किसान को कार्बन क्रेडिट का सीधा लाभ मिले। शुरुआती कठिनाइयों ने मेरा इरादा कमज़ोर नहीं किया, और पक्का कर दिया। मैंने तय किया कि यह काम अब मैं खुद करूँगा। मेरे दो सिद्धांत हैं:
“अकर्म से कर्म श्रेष्ठ”
“परिश्रम के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं”
सरकारी और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर, सरल हिंदी में और समय पर अपडेट, इसके लिए सच्चे मन से काम करूँगा।
हर नई सुविधा इसी कसौटी पर परखूँगा कि उससे किसान को क्या लाभ होता है।
ज़मीन, उपकरण और मज़दूर जैसे बाज़ार के माध्यम से गाँव में काम के अवसर जोड़ने का प्रयास करूँगा।
इन सभी परिजनों के स्नेह, आशीर्वाद और सहयोग से ही यह नया कदम उठा रहा हूँ।
WE WILL DO IT
इस पेज को शेयर करें